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तू ने दिल से

तू ने दिल से कभी अपना  
मुझे माना ही नहीं  
मेरे ज़ख़्मों में छुपे प्यार को  
जाना ही नहीं  

कितने गहरे हैं निशाँ हाथों में मेख़ों वाले  
ये तो सूरत है तेरी, तू पहचाना ही नहीं  

दूर भागेगा तू कब तक  
मुझको ठुकराएगा  
बीत लम्हा जो गया, लौट के आना ही नहीं  

ऐसी ताज़ीम1 फ़क़त होंठों से  
जो काफ़ी नहीं  
तू ने ये दिल जब मसीहा से  
लगाना ही नहीं
  1. त’ज़ीम : स्तुति, आदर, सम्मान ↩︎