इन भाषाओं में देखिए:
शोले हैं नासरी
शोले हैं नासरी के, हवाएँ बुझाएँ क्यों
ख़ादिम1 हैं हम ख़ुदा के, बलाएँ सताएँ क्यों
आँखों में रौशनी है ख़ुदावन्द के प्यार की
क़ासिद2 हैं रास्ती3 के, न रूहें बचाएँ क्यों
ताज़ा मसह में भीगे कब आए हैं ज़ेब-तन4
फ़त्ह से बढ़ के ग़लबा न शैताँ पे पाएँ क्यों
येसू के ख़ून-ए-पाक के छींटों के साथ साथ
रूह-उल-क़ुद्स5 गवाह है, कहीं और जाएँ क्यों
मल6 को ख़ुदा ने चुन लिया, अपना बना लिया
इब्न-ए-ख़ुदा के गीत न क़ुव्वत से गाएँ क्यों
- ख़ादिम : सेवक ↩︎
- क़ासिद : संदेशवा, प्रचारक, संदेश पहुंचानेवाला ↩︎
- रास्ती : धार्मिकता, राइचसनिस ↩︎
- ज़ेबतन (ज़ेब-ए-तन): सुंदर और सजा-सँवरा शरीर, शोभायमान तन ↩︎
- रूह-उ’ल-क़ुद्स : पवित्र आत्मा ↩︎
- मल : पास्टर अर्नस्ट मल का “तख़ल्लुस”
तख़ल्लुस : किसी कवि या शाइर का वह छोटा या काव्यात्मक उपनाम, जिसे वह अपनी कविता या ग़ज़ल में अपने नाम के रूप में उपयोग करते हैं; उर्दू शाइरी में इसे परंपरागत रूप से ग़ज़ल के आख़िरी शेर (मक़्ता’) में इस्तेमाल किया जाता है। ↩︎