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मेरी मन्ज़िल

मेरी मन्ज़िल  
तू मसीह राह भी तू, साथ भी तू
जो रहा साये की तरह, मुझ पे वो हाथ भी तू

मुझको छोड़ा न कभी क़ौल हैं सच्चे तेरे
रहमतों की जो रही मुझ पे वो बरसात भी तू

तेरे क़दमों पे निछावर ज़िंदगी ये मेरी
मेरा हर दिन तू मसीहा मेरी हर रात भी तू

तेरे ज़ख़्मों से बही मेरे गुनाह की क़ीमत
क़ब्र और मौत को जिस से हो गई मात1 भी तू

इस जहाँ के ज़र्रे ज़र्रे को बता दूँ शफ़ी
जो है मेरा, हूँ मैं जिस का वह फ़क़त ज़ात भी तू
  1. मात : हार, पराजय, नष्ट ↩︎