इन भाषाओं में देखिए:

तू ही भरोसा मेरा

तू ही भरोसा मेरा, तू ही सहारा मेरा
तेरे परों में छिपूँ, मोहकम क़ला1 तू मेरा
तू ही भरोसा मेरा

निगाहें मेरी अब तुझी पर लगी हैं
कुमक मेरी अब तुझी से
मेरे पाँव को तू फिसलने न देगा
मेरी हर ख़ुशी अब तुझी से
तेरे क़दमों पे सिर मेरा बढ़ा हाथ अपना सदा

मन्ज़िल है तू ही, मरकज़ है तू ही
मक़सद है जीवन का तू ही
राहबर है तू ही, दिलबर है तू ही
दिल की धक-धक है तू ही
छोड़े न तू अकेला रहता है संग-संग सदा

तूफ़ानी लहरों में हाथ बढ़ा कर
मुझको संभाला है तू ने
मौत के साये की वादी-ओ-भट्ठी
से भी निकाला है तू ने
जान का लंगर मेरा इब्न-ए-यहोवाह ख़ुदा
  1. मोहकम क़ल’अ : दृढ़ गढ़, शरण स्थान
    क़ल’अ (जो अक्सर क़िला बोला जाता है): गढ़, सुरक्षित स्थान, दुर्ग
    क़िला’ (क़ल’अ का बहुवचन) ↩︎