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डरो मत चुप चाप खड़े रहो

डरो मत चुप चाप खड़े रहो
ख़ुदा की नजात के काम देखो
ख़ुदा की नजात के काम देखो
चुप चाप तुम खड़े रहो

पूर्वी हवाएँ जब चलती हैं
ख़ुश्क ज़मीन हो जाती है
पानियों का ढेर लग जाता है
ऊँची दीवार बन जाती है

वही पानी जो डराता था
और रस्ता भी न देता था
हुक्म-ए-ख़ुदा से वही पानी
पज़मुर्दा1 हो बैठा था

ख़ुदावंद की सना मैं गाऊँगा
जलाल से फ़त्हमन्द हुआ
ख़ुदावंद मेरा साहिब-ए-जंग2 है
ख़ुदावंद मेरा ज़ोर मेरा क़ला3
  1. पज़मुर्दा : मुरझा-सा, कुम्हलाया ↩︎
  2. साहिब-ए-जंग : योद्धा (निर्गमन 15:3) ↩︎
  3. क़लअ (क़िला का सही उच्चारण): दुर्ग, शिविर, दृशस्थान ↩︎