कितना हसीन वादा
कितना हसीन वादा है ये किया ख़ुदावंद ने
जहाँ दो या तीन जमा हों मैं हूँ हाज़िर उन में
तुझे अकेला न छोड़ूँ मैं रूह अपनी भेजूँ
तुझे अनात भी न छोड़ूँ इक मददगार भेजूँ
येसू के सिवा ये कब है बात कही किस ने
दस्तक वो देता है चाहे हर दिल में आना
भरता उस को रूह से अपनी जिस ने उसे जाना
जिस का बने है माली वो कलियाँ लगीं खिलने
रूह-ए-पाक जो हाज़िर है आओ कहें ख़ुश आमदीद
इज़्ज़त दौलत हशमत जिस की उस की करें तमजीद
रूह के शोले बरसें जब फिर बदन लगे जलने